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Friday, 20 November 2009

hum bebas kyun hue?

जब इख्तिलाफ इतना था फिर हमनफस क्यूँ हुए ?
उन नीमबाज़ आँखों के आगे हम बेबस क्यूँ हुए ?
[इख्तिलाफ = difference of opinion, हमनफस = friends,नीमबाज़ = dark, बेबस = helpless]

एक ही राह के मुसाफिर, एक ही मंजिल को जाना,
जब हमसफ़र हैं हम फिर इतने अबस क्यूँ हुए ?
[अबस = indifferent]

कहता है वाइज़ की होती है अखलाख की जीत
कहा था सच मैंने फिर असिरान-ए-क़फ़स क्यूँ हुए ?
[वाइज़ = wise man, अखलाख  = virtue/Piety, असिरान-ए-क़फ़स = prisoner of cage]

माना तेरे इनकार-ए-ख़त को हमने अपना मुक्क़दर
अब समझा के उसाक-ए-बुत इतने बेकस क्यूँ हुए
[इनकार-ए-ख़त = letter of rejection, मुक्क़दर = fate, उसाक-ए-बुत = idol worshipers , बेकस = helpless ]

जब हुआ 'प्रशांत' इतात तेरे दर पे मौला,
बंद गोश बरावाज़-ए-कलीसा-ए-जरस क्यूँ हुए ?
[इतात = submission, दर = door, मौला = god, गोश = ears, बरावाज़-ए-कलीसा-ए-जरस = sound of church bells]
'प्रशांत'

1 comment:

Fani Raj Mani Chandan said...

behat khoobsoorat ghazal. urdu shabdo ke arth likhne ke liye dhanyawaad.